एक अधूरा ख़्वाब

उसकी आदत थी, वो कभी कुछ कहती ही नहीं ,

ईशारे तो दुर, वो कभी मुझे देखती ही नहीं |

पास होकर भी, रोज दुर हों जाते थे हम |

दिलो से दिलो की, मुलाकात हीं नहीं होती |

सोचता था हर रोज, की आज तो वो मुझें देखेगी जरूर |

इसलिए, सज-सँवर कर निकल जाया करता था मैं हर रोज |

लेकिन, कम्बक्त -ए-जिंदगी इतनी हसीन भी कहाँ होती |

चेहरो से चेहरो, की मुलाकात हीं नहीं होती |

यार कहने लगे थे, अब छोड़ भी दे उसकों |

बस वो तेरी जिंदगी का, एक ख्वाब ही थी |

लेकिन, तस्वीर जो उसकी मेंने अपने दिल में छुपा रखी थी|

अब उसके सिवा किसी और से मोहब्बत हीं नही होती |

उसका हँसना,उसका इतराना,उसका रूठना, उसकी हर अदा |

आज भी सब कुछ जिंदा हैं,मेरे जेहन में इस कदर |

बस अब वो नहीं हैं, उसकी वो खट्टी-मिठी यादे हीं हैं मेरे संग |

क्योंकि, अब वो मुझें अकेला छोड़ किसी और केे संंग जो चली गई |

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