कर्म कर फल की इच्छा नहीं ( by Sheena Parashar) 

तू कर्म कर फल की इच्छा नहीं                                                   सुना था यह कहीं                                                                        कहा था यह कृष्ण भगवान ने                                                   समझता आज कोई नहीं । 

क्यों मनुष्य भविष्य के सपने बुनने लगता है ।                         क्यों अपने भविष्य की सफलता के जश्न की ध्वनियां सुनने लगता है । 

क्यों बिना कुछ किए सपनों में जगता रहता है ।                       हां ऐसा ही होगा देख लेना खुश होकर खुद से कहता रहता है ।

बैठे-बैठे मनुष्य अपनी सोच से अपने सपनों का ब्रह्मा बन जाता है ।                                                                                      पर स्वप्न पूर्ण करने के लिए परिश्रम करना भूल जाता है ।

ज्ञात आए भी तो परिश्रम से घबरा जाता है।                            दो क्षण में सपनों का दर्पण टूट जाता है। 

मनुष्य को अब समझ आता है ।                                               कठिनाइयों के  भय वह निराश हो जाता है ।                            गुलाब जैसे सपनों में उसे अब असलियत का कांटा नजर आता है ।

सफलता की ध्वनियों का शोर अब सन्नाटे में बदल जाता है।  अब मनुष्य को सपनों को हकीकत में बदलना नामुमकिन सा लगने लग जाता है । 

आखिर क्यों ? 

क्योंकि वह फल की इच्छा में इतना डूब जाता है कि कर्म के सागर को पार करना उसके लिए असंभव सा हो जाता है । 

हे मनुष्य तुझे समझ क्यों नहीं आता है ?

कर्म ही तो वह नाव है जो तुझे तैर आएगी                               कर्म ही वह नाव है जो तुझे विशाल सागर पार कर आएगी।

कर्म ही तो वह  माटी है जिसमें तेरे सपनों के गुलाब खिलेंगे   कर्म ही तो वह जश्न है जिससे तेरे सफलता के ढोल नगाड़े बजेंगे ।

कर्म ही तो वह चाबी है जिससे तेरे स्वप्नों के द्वार खुलेंगे ।     

  हे मनुष्य तुम यह याद रखना ।                                                  सफलता तो उसकी है जो वर्तमान में ही जीता है ।                जो परिश्रम और कठिनाइयों का भी कड़वा पान पी लेता है। 

सफलता तो उसकी है जो                                                          भाय रूपी घाव को भी अपने  मन की दृढ़ता से सी लेता है ।

हे मनुष्य यदि कामयाबी की खुशी से तुझे करना ऊचा अपना  सर कहीं                

इसीलिए तू बस कर्म कर तू बस कर्म कर !                               फल की इच्छा नहीं ।       

This poem tires to explain that expectation are not enough for your  success you have to work really  hard to  succeed.  We all need to be focused and determined.  Dreams don’t work until you do  . So work hard and don’t expect for the result  just do your best .               

Responses

Your email address will not be published.

+