काश

काश मैं हमेशा बचपन में ही रहती

नहीं, ज़िन्दगी की ज़िम्मेदारी से डरी नहीं

लोगों की भावनाएं भी झूठी हो सकती हैं

पता चला तो भी मेरी सच्चाई हारी नहीं

बचपन की हठ में लालच नहीं था

बड़ों के पैसों के आगे झुक गया है प्यार

व्यापार और लाभ नफा में तोलकर

परिवार रूपी धन भी वो गया है हार

बचपन में दिल की बात मुँह पर होती थी

आज मन में कुछ और मुँह पर कुछ और ही बोल हैं

लोग मन में कड़वाहट नहीं होते हुए भी समझते हैं

ऐसे ही सच्चे रिश्ते बिखरते हैं

बचपन में किसी के पास जाने, न जाने में स्वार्थ न था

आज काम के बिना किसी से दो पल बात नहीं होती

माता पिता को भी बुढ़ापे में घर से निकाल देते हैं

शायद इसलिए नए रिश्ते की शुभ शुरुआत नहीं होती

बचपन की हँसी-ठिठोली आँसुओं में बदल रही है

दुनिया के साथ चलने में ह्रास हो रहा है

ज़िन्दगी आगे तो बढ़ नहीं पा रही

केवल इंसानियत का प्रतिगामी विकास हो रहा है।

-अरुणिमा गुप्ता

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