किसान

बारिश की थी उसको आस

उसके खेत और बैलों को थी पानी की प्यास
उकडू बैठा ज़मीन पर, निगाह थी आसमान पर
आसमान में बादलों का नामो-निशान नहीं
शरद का महीना पास ही।
चिंता चिता जला रही
कर्ज़ा चुकाने के पैसे नही
ज्वर से बिटिया तड़प रही
भूख प्यास के कारण दम तोड़कर, उसकी पत्नी भी गयी मर
लड़का खाने की तलाश में भटका हुआ, अब तक लौटा नही पर।
पत्नी की मौत के गम ने आंखों को सुखा दिया
बेटे के गुमशुदा होने के दर्द ने रूह को भी रुला दिया
ज़िन्दगी से खफ़ा तो था, पर लाचारी और बेसहारी में खून का घूट था पिया।
खेत की ज़मीन पर दरारें थी
उसकी आँखों में लाचारी थी
एक वक्त ऐसा भी था, जब उसके भी घर हरयाली थी
आँखों में उम्मीदों की बारिश थी
घर में ढेर सारी गुड़- धानी थी
अब याद करने पर, दिल में चुभ सी गयी वो यादें थी।
लोगो की भीड़ में अकेला ही रह गया
खुशियों के सागर का किनारा उससे कहीं दूर छूट गया
सूखे के कारण उसकी उम्मीदों का सूरज जो अस्त हुआ
वह थोड़ी बौछारों से फिर न उदय हुआ।
बेटी को देखने गया फिर
देख नज़ारा ज़मीन पर वह गया गिर
कलेजा उसका फटने को आया
वह फिर अपने आप को संभाल ना पाया
अपनी बेटी को जो मृत पाया
हाय! बेटी को गले लगाकर वह पूरी रात रोया,
आँसूओं की बारिश से अपना दामन भिगोया
उस दिन उसने अपने पूरे परिवार को खोया।
अगली सुबह गाँव वालों से उसके घर में दो लोगों को मृत पाया
उस किसान ने भी अपने आप को फाँसी पे चढ़ाया
सब कुछ खोने का गम वह सह न पाया
खोखली उम्मीदों के देश में वह रह न पाया।
अलविदा वह कह चला, जाते- जाते यह कह गया
बनके किसान किसी घर में, फिर जनमुंगा
समय दोहरायेगा कहानी फिर एक बार
क्यूंकि क्या मेरा देश बदलेगा उस बार?

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