खुद को कमज़ोर समझना ही सबसे बढ़ा पाप है | 

Life History of Swami Vivekananda

 एक युवा संन्यासी के रूप में भारतीय संस्कृति की सुगंध और महक को विदेशों में बिखेरनें वाले महान स्वामी विवेकानंद साहित्य, दर्शन और इतिहास के प्रकाण्ड ज्ञानी थे। स्वामी विवेकानंद ने ‘योग’, ‘राजयोग’ और  ‘ज्ञानयोग’ जैसे महान ग्रंथों की रचना करके युवा जगत को एक श्रेष्ठ नई राह दिखाई है जिसका प्रभाव जनजीवन और संसार पर युगों-युगों तक छाया रहेगा। कन्याकुमारी में स्थित उनका स्मारक हमेशा  स्वामी विवेकानंद की महानता की कहानी बताता है और बताता रहेगा। 

“संभव की सीमा जानने का केवल एक ही तरीका है असंभव से भी आगे निकल जाना।“


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ऐसी सोच वाले महान व्यक्तित्व थे स्वामी विवेकानंद। जिन्होनें अध्यात्मिक और धार्मिक ज्ञान के बल पर सम्पूर्ण मानव जीवन को अपनी रचनाओं के माध्यम से सीख दी ।वे हमेशा कर्म पर भरोसा रखने वाले महान पुरुष थे। स्वामी विवेकानंद जी का मानना था कि अपने लक्ष्य को पाने के लिए तब तक कोशिश करते रहना चाहिए जब तक की लक्ष्य हासिल नहीं हो जाए।

तेजस्वी प्रतिभा वाले महान पुरुष स्वामी विवेकानंद जी के विचार हमेशा काफी प्रभावित करने वाले थे जिसे अगर कोई अपनी जिंदगी में लागू कर ले तो सफलता अवश्य हासिल होती है । यही नहीं विवेकानंद जी ने अपने अध्यात्म से प्राप्त विचारों से भी लोगों को प्रेरित किया जिसमें से एक विचार इस प्रकार है –

‘उठो जागो, और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो’ ।।

स्वामी विवेकानंद जी ने आध्यात्मिक चिंतन और दर्शन से न सिर्फ लोगों को प्रेरणा दी है बल्कि भारत को पूरे विश्व में गौरान्वित कर दिया है।


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स्वामी विवेकानंद की प्रेरक जीवनी –

पूरा नाम

नरेंद्रनाथ विश्वनाथ दत्तजन्म

12 जनवरी 1863

जन्मस्थान कलकत्ता (पं. बंगाल)

पिता विश्वनाथ दत्त

माता भुवनेश्वरी देवी

घरेलू नाम नरेन्द्र और नरेन्द्र मठवासी बनने के बाद नाम स्वामी विवेकानंद

 भाई-बहन 9

गुरु का नामरामकृष्ण परमहंसशिक्षा

1884 मे बी. ए. परीक्षा उत्तीर्ण

विवाह विवाह नहीं किया

संस्थापक रामकृष्ण मठ, रामकृष्ण मिशन

फिलोसिफी आधुनिक वेदांत, राज योगसाहत्यिक कार्य राज योग, कर्म योग, भक्ति योग, मेरे गुरु, अल्मोड़ा से कोलंबो तक दिए गए व्याख्यान और अन्य महत्वपूर्ण काम न्यूयार्क में वेदांत सिटी की स्थापना, कैलिफोर्निया में शांति आश्रम और भारत में अल्मोड़ा के पास ”अद्धैत आश्रम” की स्थापना की।कथन“उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये”

मृत्यु तिथि 4 जुलाई, 1902

मृत्यु स्थान बेलूर, पश्चिम बंगाल, भारत


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स्वामी विवेकानंद जी का जीवन परिचय –

स्वामी विवेकानंद जी एक ऐसे महान पुरूष थे । जिनके उच्च विचारों से,अध्यात्मिक ज्ञान ,सांस्कृतिक अनुभव से हर कोई प्रभावित होता है। जिन्होने हर किसी पर अपनी एक अदभुद छाप छोड़ी है। स्वामी विवेकानंद का पूरा जीवन हर किसी के जीवन में नई ऊर्जा भरता है और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। स्वामी विवेकानंद प्रतिभाशील महान पुरुष थे जिन्हें सारे वेदों का पूर्ण ज्ञान था। विवेकानंद जी दूरदर्शी सोच के व्यक्ति थे जिन्होनें न सिर्फ भारत के विकास के लिए काम किया बल्‍कि लोगों को जीवन जीने की कला भी सिखाई।

स्वामी विवेकानंद भारत में हिंदु धर्म को बढ़ाने में उनकी मुख्य भूमिका रही हैं। 

स्वामी विवेकानंद बहुत शांत और दयालु स्वभाव के व्यक्ति थे । जो कि न सिर्फ मानव जाति बल्कि जीव-जंतु और प्राणी को भी इस भावना से ही देखते थे। स्वामी जी हमेशा भाई-चारा, प्रेम की शिक्षा देते थे उनका मानना था कि प्रेम, भाई-चारे और सद्दभाव से जिंदगी आसानी से काटी जा सकती है और जीवन के हर संघर्ष से आसानी से सामना किया जा सकता है। उनका मानना था कि –

“जब तक आप स्वयं पर विश्वास नहीं करते, आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते ।।”

स्वामी विवेकानंद जी के अनमोल विचारों ने उनको महान पुरुष बनाया हैं। उनका अध्यात्म ज्ञान, धार्मिकज्ञान , ऊर्जा, समाज, संस्कृति, देश प्रेम, परोपकार, सदाचार, आत्म सम्मान के समन्वय काफी मजबूत रहा हैं। वहीं ऐसा उदाहरण कम ही देखने को मिलता है इतने गुणों से धनी व्यक्ति ने भारत भूमि मे जन्म लेना भारत को पवित्र और गौरान्वित करना है ।

स्वामी विवेकानंद जी ने रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो आज भी भारत में सफलता से चल रहा है। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुवात “मेरे अमेरिकी भाइयो और बहनों” के साथ करने के लिए जाना जाता है। जो शिकागो विश्व धर्म सम्मलेन में उन्होंने हिंदु धर्म की पहचान कराते हुए देखा है ।


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स्वामी विवेकानन्द का शुरुआती जीवन –

महान पुरुष स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म 12 जनवरी 1863 के दिन को हुआ था। अद्भुत प्रतिभा के धनी व्यक्ति ने  कोलकाता में जन्म लेकर वहां की धरती को पवित्र कर दिया। स्वामी जी का असली नाम नरेन्द्रनाथ दत्ता था । लेकिन बचपन में प्यार से सब उन्हें नरेन्द्र नाम से ही पुकारते थे।

स्वामी विवेकानंद जी के पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था । जो कि उस समय कलकत्ता हाईकोर्ट के नामी और सफल वकील थे।उनकी वकालत के बहुत चर्चा हुआ करती थी । इसके साथ ही उनकी अंग्रेजी और फारसी दोनों भाषा में भी काफी अच्छी पकड़ थी।

स्वामी विवेकानंद जी की माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था ।जो कि काफी धार्मिक विचारों की महिला थी । जिन्होनें हिंदू धार्मिक ग्रंथों जैसे रामायण और महाभारत में से काफी अच्छा ज्ञान प्राप्त किया था। साथ ही साथ वे प्रतिभाशाली और बुद्धिमानी महिला थी ।

स्वामी जी पर अपनी मां की छत्रसाया का इतना गहरा प्रभाव पड़ा। वे हमेशा घर में ही ध्यान में तल्लीन हो जाया करते थे । इसके साथ ही उन्होनें अपनी माताजी से भी ज्ञान प्राप्ती की थी। उसके साथ ही स्वामी विवेकानंदजी पर अपने माता-पिता के सद्गुणों का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था और उन्हें अपने जीवन में अपने ही घर से ही आगे बढ़ने की उत्साह और प्रेरणा मिली थी ।

महान पुरुष स्वामी विवेकानंद जी के माता और पिता के अच्छे संस्कारो और अच्छी परवरिश के कारण ही स्वामीजी के जीवन को एक अच्छा आकार और एक उच्चकोटि की सोच मिली थी ।

कई किताबों में वर्णन आता है कि नरेन्द्र नाथ बचपन से ही काफी नटखट और काफी तेज बुद्धि के बालक थे। वे अपनी प्रतिभा के इतने प्रखर थे कि एक बार जो भी उनके नजर के सामने से गुजर जाता था वे कभी भूलते नहीं थे और दोबारा उन्हें कभी उस चीज को फिर से पढ़ने की जरूरत भी नहीं पढ़ती थी।

स्वामी जी की माता उन्हसे हमेशा कहती थी की, “मैंने शिवजी से एक पुत्र की प्रार्थना की थी, और उन्होंने तो मुझे एक शैतान ही दे दिया”।

युवा दिनों से ही उनमे आध्यात्मिकता के क्षेत्र में काफी रूचि थी, वे हमेशा भगवान की तस्वीरों जैसे शिव, राम और सीता के सामने ध्यान लगाकर साधना किया करते थे। साधुओ और संन्यासियों की बाते उन्हें हमेशा से ही प्रेरित करती रही।

वहीं आगे जाकर यही नरेन्द्र नाथ दुनियाभर में ध्यान, अध्यात्म, राष्ट्रवाद हिन्दू धर्म, और संस्कृति का वाहक बने और स्वामी विवेकानंद के नाम  से प्रसिद्ध हो गए।


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स्वामी विवेकानंद जी की शिक्षा –

जब नरेन्द्र नाथ 1871 में उनका ईश्वर चंद विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में प्रवेश कराया गया।

सन 1877 में जब नरेन्द्र तीसरी कक्षा में थे तब उनकी पढ़ाई बाधित हो गई थी दरअसल उनके परिवार को किसी कारण की वजह से अचानक रायपुर जाना पड़ा था।

सन 1879 में, उनके परिवार का कलकत्ता वापिस आ जाने के उपरांत प्रेसीडेंसी कॉलेज की एंट्रेंस परीक्षा में अव्वल डिवीज़न लाने वाले वे पहले विद्यार्थी बने थे।

वे भिन्न – भिन्न विषयो जैसे दर्शन शास्त्र, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य के उत्सुकतावादी पाठक रहे थे। हिंदु धर्मग्रंथो में भी उनकी बहोत अधिक रूचि थी जैसे वेद, पुराणउपनिषद, भगवत गीता, रामायण और महाभारत। नरेंद्र हमेशा शारीरिक योग, योगाभ्यास, खेल और सभी गतिविधियों में सहभागी होते थे।

सन 1881 में उन्होनें ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण की थी वहीं सन 1884 में उन्होनें कला विषय से ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त कर ली थी।

इसके बाद उन्होनें सन 1884 में अपनी बी ए की परीक्षा अच्छी योग्यता से उत्तीर्ण की और फिर वकालत की पढ़ाई भी की।

सन 1884 का समय जो कि स्वामी विवेकानंद जी के लिए बेहद दुःखद था । क्योंकि इस समय उन्होनें अपने पिताजी को खो दिया और पिताजी के मृत्यु के बाद उनके ऊपर अपने भाईयो-बहनों की जिम्मेदारी आई लेकिन वे घबराए नहीं और अपने दृढ़संकल्प से जिम्मेदारी को बखूबी पूरा किया ।

स्वामी विवेकानंद जी की दर्शन, धर्म, इतिहास और समाजिक विज्ञान जैसे विषयों में काफी अच्छी रूचि थी। वेद उपनिषद, रामायण, गीता,पुराण और हिन्दू शास्त्र वे काफी उत्साह के साथ पढ़ते थे यही वजह है कि वे ग्रन्थों और शास्त्रों के परिपूर्ण ज्ञाता थे।

स्वामी विवेकानंदजी पढ़ाई में तो अव्वल रहते थे । इसके अलावा वे शारीरिक व्यायाम, खेलों में भी काफी हिस्सा लेते थे।

स्वामी विवेकानंद जी ने यूरोपीय इतिहास का पूर्ण अध्ययन जेनेरल असेम्ब्ली इंस्टीटूशन में किया था।

स्वामी विवेकानंदजी को बंगाली भाषा की भी अच्छी समझ थी। उन्होनें स्पेंसर की किताब एजुकेशन का बंगाली में अनुवाद किया हैं। वे हर्बट स्पेंसर की किताब से काफी प्रभावित थे।

स्वामी विवेकानंदजी के प्रतिभा और नटखटपन के चर्चे उनके बाल अवस्था से ही थे। उन को बचपन से ही अपने गुरुओं की काफी प्रशंसा मिली है इसलिए उन्हें “श्रुतिधर” भी कहा गया है।

स्वामी विवेकानंदजी बचपन से ही बड़ी जिज्ञासु प्रवृत्ति के रहे थे । यही कारण है कि उन्होनें एक बार महर्षि देवेन्द्र नाथजी से प्रश्न पूछा था कि ‘गुरूजी क्या आपने ईश्वर को देखा है?’ नरेन्द्रजी के इस प्रश्न से महर्षिजी आश्चर्य में पड़ गए और फिर उन्होनें इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए विवेकानंद जी को रामकृष्ण परमहंस के पास जाने की उत्तम सलाह दी ।जिसके बाद नरेन्द्र ने उनको अपना गुरु मान लिया और उन्हीं के बताए गए भक्ति मार्ग पर आगे चलते गए।

इसी दौरान विवेकानंद जी रामकृष्ण परमहंस जी से इतने प्रभावित हुए थे कि उनके मन में अपने गुरु के प्रति कर्तव्यनिष्ठा और श्रद्धा बढ़ती चली गई थी । सन 1885 में रामकृष्ण परमहंस कैंसर रोग से पीड़ित हो गए जिसके बाद विवेकानंद जी ने अपने गुरु की काफी सेवा की। इस तरह गुरु और शिष्य के बीच का रिश्ता काफी मजबूत होता चला गया था।


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रामकृष्ण मठ की स्थापना –

रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु हो गई जिसके बाद नरेन्द्र ने वराहनगर में रामकृष्ण संघ की स्थापना की। बाद में इसका नाम रामकृष्ण मठ कर दिया गया था।

रामकृष्ण मठ की स्थापना के बाद नरेन्द्र नाथ ने ब्रह्मचर्य की शपथ और त्याग का व्रत लिया और वे नरेन्द्र से स्वामी विवेकानन्द जी हो गए।

स्वामी विवेकानंद का भारत भ्रमण –

महज 25 साल की उम्र में ही स्वामी विवेकानन्दजी ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए था। और इसके बाद वे पूरे भारत वर्ष की पदयात्रा के लिए निकल पड़े। अपनी पदयात्रा के दौरान अयोध्या, वाराणसी, आगरा, वृन्दावन, अलवर ,दिल्ली और कन्याकुमारी समेत कई जगहों पर पहुंचे थे।

इस पदयात्रा के दौरान वे राजाओं के महल में भी रुके थे और गरीब लोगों की झोपड़ी में भी रुके थे । पद यात्रा के दौरान उन्हें अलग-अलग क्षेत्रों और लोगों की जानकारी मिली। इस दौरान उन्हें जातिगत भेदभाव जैसी कुरोतियों का पता चला जिसे मिटाने की कोशिश भी की।

23 दिसम्बर 1892 को विवेकानंद कन्याकुमारी पहुंचे जहां 3 दिन तक एक गहरी समाधि में रहे। यहां से वापस लौटकर वे राजस्थान के आबू रोड में अपने गुरुभाई स्वामी ब्रह्मानंद और स्वामी तुर्यानंद से मिले थे ।

इसके बाद उन्होनें अमेरिका जाने का फैसला लिया।

स्वामी विवेकानंद जी के अमेरिका यात्रा के बाद उन्होनें दुनिया में भारत के प्रति सोच में बड़ा बदलाव किया था।


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स्वामी जी की अमेरिका यात्रा और शिकागो भाषण सन 1893 – विश्व धर्म सम्मेलन –

सन 1893 में विवेकानंदजी शिकागो पहुंचे थे। जहां स्वामी जी नें विश्व धर्म सम्मेलन में हिस्सा लिया था । इस दौरान एक जगह पर कई धर्मगुरुओ ने अपनी धार्मिक किताब रखी वहीं भारत के धर्म के वर्णन के लिए श्रीमद् भगवत गीता रखी गई थी। जिसका खूब मजाक उड़ाया गया था। लेकिन जब विवेकानंदजी में अपने अध्यात्म और ज्ञान से भरा भाषण की शुरुआत की तब सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

स्वामी विवेकानंद जी के भाषण में जहां वैदिक दर्शन का ज्ञान हुआ था वहीं उसी में दुनिया में शांति से जीने का संदेश भी छुपा था, अपने भाषण में स्वामी जी ने कट्टरतावाद और सांप्रदायिकता पर जमाकर प्रहार किया ।

इस दौरान भारत की विश्व में एक नई छवि बनाई  इसके साथ ही स्वामी जी लोकप्रिय होते चले गए।


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स्वामी विवेकानंद जी के अध्यात्मिक कार्य –

धर्म संसद के खत्म होने के बाद 3 सालों तक स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका में जमकर वेदांत और योग की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करते रहे। वहीं अमेरिका की अखबार ने स्वामी विवेकानंद जी को ”Cylonic Monik from India” का नाम दिया था।

2 साल स्वामी जी नें शिकागो, न्यूयॉर्क, डेट्राइट और बोस्टन में व्याख्यान दिए । वहीं सन 1894 में न्यूयॉर्क में उन्होनें वेदांत सोसाइटी की स्थापना की।

सन 1895 में स्वामी जी की व्यस्तता का प्रभाव उनकी सेहत पर पड़ने लगा था । जिसके बाद उन्होनें व्याख्यान देने की बजाय योग से संबंधित कक्षाएं देने का निर्णय लिया । वहीं इस दौरान भगिनी निवेदिता उनकी शिष्या बनी जो कि उनकी प्रमुख शिष्यों में से एक है।

वहीं सन 1896 में वे ऑक्सफॉर्ड विश्व विद्यालय के मैक्स मूलर से मिले थे। जिन्होनें स्वामी जी के गुरू रामकृष्ण परमहंस की जीवन पर एक किताब लिखी थी। इसके बाद 15 जनवरी 1897 को स्वामी विवेकानंद अमेरिका से श्रीलंका पहुंचे ।उनका वहा जोरदार स्वागत हुआ उस समय तक वे काफी लोकप्रिय हो चुके थे और लोग उनकी प्रतिभा का लोहा मानते थे।

बाद में स्वामी जी रामेश्वरम में पहुंचे और फिर वे वहा से कोलकाता चले गए जहां उनके व्याख्यान सुनने के लिए दूर-दूर से काफी सारी संख्या में लोग आते थे। स्वामी विवेकानंद जो अपने भाषणों में हमेशा विकास की बात किया करते थे।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना –

स्वामी विवेकानंद जी 1 मई 1897 को कोलकाता वापस लौटे और फिर उन्होनें रामकृष्ण मिशन की स्थापना की । जिसका मुख्य और बडा मुख्य उद्देश्य नए भारत के निर्माण के लिए अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और साफ-सफाई के क्षेत्र में अग्रसर कदम बढ़ाना था।स्वामी विवेकानंद जी नौजवानों के लिए आदर्श बन गए थे।सन 1898 में स्वामी विवेकानंद जी ने बेलूर मठ की स्थापना की। स्वामी विवेकानंद जी ने अन्य 2 मठों की और स्थापना की।

 पूरी दुनिया में संस्कृति का प्रचार-प्रसार

स्वामी विवेकानंद जी ने अपनी ज्ञान और दर्शन के माध्यम से लोगों में धर्म के प्रति नई और विस्तृत समझ को विकसित की।

स्वामी विवेकानंद जी भाईचारे और एकता को महत्व देते थे। इसलिए उन्होनें हर इंसान के लिए नया और विस्तृत नजरिया रखने की सीख दी थी ।

महान पुरुष विवेकानंद जी ने सीख और आचरण के नए सिद्धांत स्थापित किए।

स्वामी विवेकानंद जी ने पूर्व और पश्चिम देशों को आपस में जोड़ने में अहम योगदान दिया था ।

स्वामी विवेकानंद जी ने अपनी रचनाओं के द्वारा से भारत के साहित्य को अधिक मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

स्वामी विवेकानंद जी अपनी पैदल भारत यात्रा के दौरान जातिवाद को देखकर बेहद दुःखद हुए थे। जिसके बाद में उन्होनें इसे खत्म करने के लिए नीची जातियो के महत्वता को समझाया था और उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने का काम किया।

स्वामी विवेकानंद जी ने भारतीय धार्मिक रचनाओं का सही अर्थ समझाने में अद्भुत योगदान दिया था।


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स्वामी विवेकानंद जी की मृत्यु –

दिन 4 जुलाई 1902 को 39 साल की उम्र में स्वामी विवेकानंदजी की मृत्यु हो गई। उनके शिष्यों की माने तो स्वामी जी ने महा-समाधि ली थी। स्वामी जी ने अपनी भविष्यवाणी को सही साबित किया की वे 40 साल से ज्यादा नहीं जीने वाले । महान पुरुषार्थ वाले महान पुरूष का अंतिम संस्कार गंगा नदी के तट पर किया गया ।

स्वामी विवेकानंद के विचार –

अत्यंतता प्रभावशाली और बुद्धिजीवी स्वामी विवेकानंद जी के विचारों से हर व्यक्ति प्रभावित होता था ।क्योंकि स्वामी विवेकानंद जी के विचारों में राष्ट्रीयता हमेशा से शामिल रही थी । स्वामी जी हमेशा देशवासियों के विकास के लिए काम किया करते थे।

“स्वामी विवेकानंद जी मानते थे कि हर शख्स को अपनी जिंदगी में एक विचार या फिर संकल्प निश्चत करना चाहिए और अपनी पूरी जिंदगी उसी संकल्प के लिए न्यौछावर कर देना चाहिए , तभी आपको सफलता मिल सकेगी।”


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स्वामी विवेकानंद जी के विचारों का संग्रह 

1. हम वही है जो हमारे विचार हमें बनाते हैं | इसलिए अपने विचारों के लिए सजग हो जाओ |

2. दिन में एक बार अपने आप से बात  करो वरना तुम दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण आदमी से बात नहीं कर पाओगे

3. उठो , जागो और तब तक मत रुको जब तक अपने लक्ष्य को न पा लो

4. सारी शक्ति तुम्हारे अंदर ही है | तुम हर चीज़ कर सकते हो

5. विश्वास करो विश्वास करो अपने में और भगवान में |

6. दिल और दिमाग के बिच में अपने दिल को सुनो |

7. लोग मुझपर हस्ते हैं क्योकि में अलग हु . में लोगो पर हस्त हु क्यों की वो सब एक जैसे हैं |

8. तुम भगवान् में तब तक विश्वास नहीं कर सकते जब तक तुम खुद पर विश्वास नहीं करोगे |

9. एक विचार लो और उस विचार को अपनी ज़िंदगी बना लो | उसी विचार के बारे में सोचो , उसी के सपने देखो उसी को जियो |

10. अपने में बहुत सी कमियों के बाद भी हम अपने से प्रेम करते हैं तो दूसरों में ज़रा सी कमी से हम उनसे कैसे घ्रणा कर सकते हैं |

11. खड़े हो जाओ , और सारी जिम्मेदारी अपने कंधो पर ले लो . अपने को कमज़ोर समझना बंद कर दो |

12. केवल वही जीते रहेंगे जो औरो के लिए जीते हैं .

13. अगर एक दिन भी ऐसा बिता की तुम्हे एक भी परेशानी नहीं आई तो समझ लो की तुम गलत रास्ते पर जा रहे हो

14. दर्द और ख़ुशी दोनों ही अच्छे टीचर हैं|

15. वेदांत कहता है कोई भी पाप नहीं है बस गलतियां हैं | और सबसे बढ़ी गलती है अपने से कहना की तुम कमज़ोर हो |

16. कुछ ऊर्जावान मनुष्य एक साल में इतना कर देते हैं जितना भीड़ १००० साल में भी नहीं कर सकती |

17. खुद को कमज़ोर समझना ही सबसे बढ़ा पाप है |

https://motivationpedia.com/सर्दी-में-मुगंफली-खानें-क/

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https://motivationpedia.com/meditation-कैसे-करते-हैं-और-फायदा-कै/

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