गांधी- घड़ी की रफ्तार

कविता

गांधी- घड़ी की रफ्तार

हाँ!

उस दिन कुछ देर हो गई थी

घड़ी की रफ्तार को

पीछे छोड़ते हुए

तेज कदमों से चले थे

अपने अंतिम गन्तव्य की ओर

तुम्हारें कदमों से होड़ लेते लेते

घड़ी की सुइयां थक सी गई थी

थोड़ा विश्राम चाहती थी

सूर्यास्त की गोद मे बैठकर

तुम आगे निकल गए

समय को पीछे छोड़कर

अब नहीं है कोई घड़ी

जो तुम्हारे कदमों को नाप सके

हमें सही सही समय बता सके

रास बिहारी गौड़

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