चंद लम्हों के लिए

जब खो दो तुम उम्मीद

जब खुद से ही हारने लगो

जब दुनिया को खुद पर हावी होता देखो

जब और लड़ने से डरने लगो

तब याद करना उस परमात्मा को

तब याद करना उस अथाह प्रेम के सागर को

तब याद करना उसे जो तुम्हारी हिम्मत है

तब याद करना उसे जिसकी तुम हिम्मत हो

याद करना अपने परिवार को, अपनी पहचान को

भूल जाना उसे जो तुम्हें कचोट रहे हैं

भूल जाना उसे जो तुम्हारी इस दशा का ज़िम्मेदार है

भूल जाना उन सारी नकारात्मकता को

जो उम्मीदों को तोड़ रही है

भूल जाना अपनी सारी ज़िम्मेदारियों को

बात करना अपनी माँ से वो बल्ले से टूटा बल्ब याद है!

बात करना अपने पिता से वो राजेश खन्ना वाली मूवी याद है!

बात करना अपने हमसफर से वो पहली मुलाकात याद है!

बात करना अपने बच्चे से वो स्कूल का पहला दिन याद है!

फिर सोचना,

परेशानी बड़ी या वो पुराने हसीन लम्हें

दुनिया बड़ी या वो प्यारा सा परिवार

सकारात्मकता बड़ी या वो नकारात्मकता

और अंत में,

तकलीफें बड़ी या मेरा हौसला!!

चंद लम्हों के लिए ऐसा करना, ऐसा सोचना मुश्किल नहीं, किन्तु ऐसा कर लेने से-

हर मुश्किल से लड़ने का साहस मिल जाएगा।

जीतने का नया हौसला जन्म लेगा।

खुश होने की वजह उत्पन्न होगी।

हर इम्तेहान में जीत होगी।

हो गर खुद पर यकीन

मंज़िलें अब दूर नहीं

रास्ते पथरीले हो सकते हैं

मगर पैर इतने कमज़ोर नहीं।।

-अरुणिमा गुप्ता

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