दिल की बात

कभी टूट जाती हूँ

कभी रो देती हूँ

किसी को दुख न पहुँचे

दिन रात इसी दुआ में जीती हूँ

लोगों की हँसी की वजह हूँ

कभी अश्रु न निकलने दूँ

सारे रिश्ते संभाल पाऊँ

इन मोतियों को यूँ न बिखरने दूँ

इस छोटी सी दुनिया में

अपनों को संजोती हूँ

अपनों को पाने में कई बार

अपनों को ही खो देती हूँ

गलतफहमी न हो रिश्ते में

यही दीप जलाती हूँ

दूसरों की तकलीफ़ों में

खुद भी जल जाती हूँ

रिश्तों को जिताने के लिए

हारना मंज़ूर है

रिश्ते निभाने का न जाने

यह कैसा फितूर है।

-अरुणिमा गुप्ता

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