दीपावली

दीवाली के दीपक जल रहे हैं

बिखेर दो तुम भी खुशियों की रोशनी

मिठाई के डिब्बे बिक रहे हैं

दूसरों के जीवन में भी भर दो चाशनी

पटाखे खुशियों का नाम नहीं

फिर भी हर्ष उल्लास है

इतने शोर में भी दिल में

एक अनकही सी आस है

वंचित ना रहे घर एक भी

दीपक के जलने से

खाली न रहे बच्चों के हाथ

फुलझड़ी न होने से

नन्ही सी जान मजबूर न हो

इस सोच को अपनाने के लिए

खुशियाँ पैसों से खरीदी जाती है

यह नाम है सिर्फ अमीरों के लिए

त्योहार को त्योहार की पहचान दें

अमीर और गरीब के बीच न हो जंग

मिलनसार हो यह दीपावली

बिखर जाए समानता के रंग।।

                   – अरुणिमा गुप्ता

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