भारत

                      

जब सो रहा था ये पूरा शहर,

मैं खुद से ही लड़ रही थी हर पहर।

जब उठा ये शहर लेकर अपने ज़हन में धुआ और राख,

अपने देश की ऐसी स्तिथि देखकर मेरे सीने में लगी एक आग।

आग थी वो ऐसी जो कभी बुझ ना पाई,

एक कमजोर सी लड़की को उस धुएं ने एक मुकम्मल मंज़िल की राह दिखाई।

आज भी जब सोचती हूं उस धुएं बारे में,

रूह काप जाती है मेरी;

ऐ “भारत” देख क्या स्थिति कर दी तेरे अपने ही लोगों ने तेरी।

ये शहर सदियों से उसी राख में जीता है,

और उस राख का पानी मेरा बेचारा भारत पीता है

आज भी हर दिन, ये शहर धुआं बनाकर चैन से सोता है,

कोई उसकी तरफ भी देखो कि उसे कितनी तकलीफ होती है और वो ना जाने कितना रोता है।

मैं जानती हूं कि तुम कमजोर हो,

पर सोचो उन लोगों के बारे में जो सच्चे दिल से तुम्हे चाहते है

अपना सब कुछ सिर्फ तुम्हीं पर लुटाते है।

ऐ दोस्त हिम्मत रखो तुम –

हम कुछ मुट्ठी भर लोग एक उम्मीद की कश्ती में चप्पू चलाते है। 

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