माँ

रिश्तों की इतनी समझ तो नहीं थी मुझे

आँख खुलते ही माँ का आँचल देखा था

पहली बार पलक भी न झपकी थी कि

निःस्वार्थ प्रेम का वो उदाहरण देखा था

चेहरे की उस मुस्कान का कोई मोल नहीं है

उस अनमोल तोहफे को सदा संजोए रखना

जिसकी खामोशी का एहसास हर पल होता है

उस निर्जीव मकान को जीवित घर बनाए रखना

घूमने के लिए दुनिया भले ही बहुत बड़ी है

चैन की दुनिया तो सिर्फ एक गोद में समाई है

खूब जोड़ लिया है धन इतना भटककर किन्तु

सर पर वो हाथ सहलाना ही दिन भर की कमाई है

वो सुबह के सौ चक्कर हमें उठाने के लिए

शायद हर कोई नहीं लगा सकता है

हमारे सभी नखरों के बीच में नए पकवान

शायद हर कोई नहीं बना सकता है

उसके नाम एक दिन करके उत्सव मना रहे हैं आज

जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी बच्चों के नाम कर दी

उस माँ को खुश रखना ही हो उद्देश्य हमारा

जिसने स्वयं की सभी खुशियाँ हम पर कुर्बान कर दी

जिसकी हर भावना को हम ममता कह देते हैं

वो एक ही शब्द माँ पूरा जहां होती है

हम सदैव ऋणी है उसके क्योंकि

केवल एक माँ ही माँ का पर्याय होती है

– अरुणिमा गुप्ता

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