मेरे देश के नाम खत

विकास के पथ पर अग्रसर ऐ मेरे आज़ाद देश,

जहाँ कई सीने 24 घंटे तैयार हैं होने लहू से लथपथ

वहीं कई युवा मलिन हो रहे भारत से भी नहीं है अवगत

आ, मेरे देश, आज तुझको भी आईना दिखा दूँ

शायद इस खत के ज़रिए, भटकों को कुछ सिखा दूँ।

हे देश, सच है कि तुम ही हो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के हकदार। हो तुम विश्व की वाह-वाही के काबिल। तुम्हें इस उपलब्धि के लिए शत शत नमन। किन्तु, काश तुम इस लोकतंत्र का हो रहा दुरुपयोग भी देख पाते। हमारा लोकतंत्र ही वजह है कि यौन उत्पीड़न,बलात्कार जैसे अपराध भी बड़े नहीं महसूस हो रहे हैं, और गुनाहगार फाँसी के फंदे नहीं झूल रहे हैं। यह हमारे लोकतंत्र की ही कमज़ोरी है कि यहाँ पढ़े लिखे काबिल अनारक्षित लोग बेरोज़गार घूम रहे हैं और तथाकथित पिछड़ी जाति वाले लोग आरक्षण का अनुचित लाभ उठाकर देश के विकास में बाधा बन रहे हैं।

सालों पुराने हमारे लोकतंत्र को

अँधे होकर तो मत अपनाओ

आज की परिस्थिति देखते हुए

लोकतंत्र में कुछ बदलाव लाओ

हे भारत माता, तुम्हारे बारे में थोड़ा और विचार किया तो एहसास हुआ कि तुम्हें ‘माता’ कहकर संबोधित करना हमारा गौरव है। तुमने ही तो हमें एक डोर से बांध रखा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, गुजरात से अरुणाचल तक, सब तुम्हारा ही तो हिस्सा है। 29 राज्यों को, 22 भाषाओं को, अनगिनत प्रकार की संस्कृतियों और भोजन को एक साथ सींचना तुम्हारे ही बस की बात है। इसके लिए तुम सराहनीय हो। लेकिन तुम्हारे सारे वंश तुम्हारी धरोहर का ध्यान नहीं रख पा रहे हैं। कहीं छिड़ रहा है युद्ध हिन्दु मुसलमान में, कहीं जात पात ही संग्राम का विषय बन रहा है। तुम्हारी “अनेकता में एकता” से बने इस संयुक्त राष्ट्र की नींव अब हिल रही है माँ।

कब तक यूँ मूक बनी रहेगी

सुन ले इस औलाद की पुकार

अब तो इस चुप्पी को तोड़ दे माँ

अन्यथा, मच जाएगा तेरे आँगन में हाहाकार

न जाने कितने सपने संजोए थे उन आँखों ने जिन्होंने हमारे देश को आज़ाद कराया था। सोच तो बहुत अच्छी थी कि दो या दो से अधिक दल होंगे, एक सरकार बनाएगी, और बाकी उसकी गलतियाँ ढूंढकर मिल जुलकर देश को आगे बढ़ाएगी। किन्तु उनके सपने तो सपने ही रह गए। आज राजनीति की ओर देखने से भी कतरा रहा है एक सभ्य नागरिक। क्योंकि तुम्हारे समृद्धि और विकास तो एक कोने में बैठे रो रहे हैं, जिन्हें सभी सत्ताधारियों ने नज़रअंदाज़ कर दिया है। आज राजनीति का अर्थ राज्य की नीतियों पर ध्यान देना नहीं है बल्कि साम-दाम-दंड-भेद अपनाकर सत्ता अपने हाथ में रखना मात्र रह गया है। आज एक दूसरे पर ताने कसकर, आरोप प्रत्यारोपण करकर तुम्हारे तथाकथित राजनेता(अर्थात राज्य के नेता) अपने राज्य के गौरव को उसकी ही आँखों में गिरा रहे हैं।

इस राजनीति को झेलते झेलते

अब हार गई है तुम्हारी जनता

कुछ तो जादू कर दो मेरे वतन

तुम ही हर लो हमारी चिंता

और क्या कहूँ, विश्व में सबसे आध्यात्मिक होने का खिताब भी तुम्हारे ही नाम है। तुम ही हो हर धर्म, हर सम्प्रदाय को स्वीकार करने और आगे बढ़ाने वाले। तुम ही हो श्रद्धा के अपार सागर। तुम्हें मेरा कोटि कोटि नमन। लेकिन तुम क्या चाहते थे और क्या हो रहा है! जहाँ हर धर्म, हर सम्प्रदाय से कुछ सीखना उद्देश्य था, वहाँ अपने धर्म को दूसरों से श्रेष्ठ बताने की बहस छिड़ी हुई है। और श्रद्धा और विश्वास तो, पता ही नहीं चला कब अंधश्रद्धा और अंधविश्वास का रूप ले चुके। आजकल लोग भगवान की चौखट पर कम और तांत्रिकों तथा बाबाओं के पास ज्यादा दिखाई देते हैं। उन्हें उन लोगों में जीवित ईश्वर दिखते हैं, जो यदि वो एकाग्र होकर अपने अंदर ढूंढे तो वहां भी मिल सकते हैं। आजकल अंधविश्वास विश्वास के नाम से खुले बाज़ारों में बिक रहा है। पढ़े लिखे तथाकथित समझदार लोग भी बिल्ली के रास्ता काटने पर अपना रास्ता बदल लेते हैं। यहाँ लोग तपस्या के नाम पर खुद को पीड़ा पहुँचा सकते हैं, परन्तु दूसरों की पीड़ा कम करने का तो सोच भी नहीं पाते। यह अंधश्रद्धा नहीं तो और क्या है?

बढ़ती तकलीफों से हार रहे

बढ़ रहा अंधविश्वास है

तुम ही कुछ हल निकालो

तुमसे ही अब सब आस है

मैं तुम्हें खत लिखूँ और तुम्हारे सबसे प्रिय, तुम्हारे अपने बेटों को ही भूल जाऊँ! जो सिर्फ तुम्हारे लिए ही जीते हैं, और तुम पर ही जान कुर्बान कर देते हैं। हाँ, तुम्हारे बेटे! तुम्हारे जवान! तुम्हारे सिपाही! वही तो है तुम्हारी शान। लेकिन उनके साथ यह क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है? क्यों बंधे हुए हैं उनके हाथ हमारे सरकार नामी बेड़ियों से? क्यों आज़ाद नहीं है वो? सरकार के कहने पर सर्जिकल स्ट्राइक हो जाए, और वो ना कहे तो दुश्मनों को छू भी नहीं पाए! कई बार तो सरकार को पता भी नहीं चलता कि जिसे वो ‘जवान’ कहकर संबोधित करना चाहते थे, वो तो अब शहीद पुकारा जाने लगा है। ऐसे अनाम हुए शहीदों की तरह हमारी सोने की चिड़िया अर्थात तुम भी कहीं गुम हो रही हो।

सोने की चिड़िया हुआ करता था

बड़ों का सत्कार और सम्मान सिखाता था

हर घर, हर दिल अपना सा लगता था

न जाने क्यों, यह कल ही हुआ करता था

यह सब कल हुआ तो करता था, पर क्या आज हो सकता है? क्या कल हो पाएगा? हाँ हो सकता है और ज़रूर होगा। क्योंकि तुम अकेले नहीं हो, तुम समूह हो सवा सौ करोड़ लोगों का। यह तुम्हारी ताकत है। हम सब मिलकर बदलाव ला सकते हैं। बस कुछ करने की आवश्यकता है। हमारी न्यायपालिका को सख्त, सशक्त होना होगा और समय सीमा का ध्यान रखना होगा। वर्षों पहले जिस आधार पर आरक्षण की नींव रखी गयी थी, आज के हालात और ज़रूरतों को देखकर उन आधारों को बदलना होगा। धर्म-सम्प्रदाय में ऊँच-नीच हम नागरिकों की सोच नहीं है। यह तो अपनी कुर्सी बचाने के लिए कुछ राजनेताओं का शस्त्र है, जो हमें ही काट रहा है। लोगों को उनकी बातों में न आकर अपने विवेक का इस्तेमाल करना होगा। वहीं राजनेताओं को भी अपने मानवीय मूल्यों को तवज्जो देकर नैतिकता से कार्य करना होगा, जो तुम्हारे हित में हो, सिर्फ स्वयं के हित में नहीं। लोगों की भक्ति और श्रद्धा का तो क्या कहना! अब ज़रूरत है तो समझदारी से वास्तविकता को स्वीकारने की। परेशानियों से लड़ने के लिए आंतरिक हिम्मत का सहारा लेना होगा, किसी बाबा का नहीं। और अपने सैनिकों के लिए तो यही आशा है मन में-

कर दो इन परिंदों को आज़ाद

इनके जज़्बातों को ना सुलाया जाए

जहाँ कर सकते थे तुम इन पर नाज़

वहां इनके मन को ना रुलाया जाए

जिस दिन ऐसा हो जाएगा उस दिन-

आईना देखकर सबकुछ सँवर जाएगा

देश में कुछ बदल जाएगा

गर मुश्किलों से लड़ें एक होकर

पुनः, देश सोने की चिड़िया बन जाएगा

तुम्हारी

एक देशभक्त नागरिक

अरुणिमा गुप्ता

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