वैचारिकी- लोकसभा में लोकतंत्र शर्मशार

आज लोकसभा में राष्ट्रपति अभिभाषण पर देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी का भाषण सुना। आश्चर्य मिश्रित दुःख हुआ कि लोकसभा का पटल शोरगुल, नारें और जुमलेबाजी की सस्ती चौपाल बनकर लोकतंत्र को शर्मशार कर रहा था।

एक ओर विपक्ष अपना शालीन दायित्व नही निभा रहा था, दूसरी ओर प्रधानमंत्री विपक्षी आरोप प्रत्यारोप में उलझ कर देश की महत्वपूर्ण समस्याओं को नजरअंदाज कर रहे थे। चूंकि विपक्ष की अपेक्षा सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी ज्यादा होती है ,अतः उसका आचरण भी पहले सवालों कर घेरे में आता है।

बहरहाल, प्रथम पुरुष एक वचन में बोलते हुए प्रधानमंत्री देश का विभाजन, प्रथम प्रधानमंत्री प.नेहरू, सरदार पटेल से लेकर राजीव गांधी के प्रति एक विशिष्ट अवहेलना का भाव जता रहे थे। सम्भवतः उनका प्रसंशक मतदाता इससे खुश हो, किन्तु क्या वे स्वम उस कथन का विरोध कर रहे थे कि देश निर्माण में सभी का योगदान है। वे स्वम सत्ता के शिखर पर उसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से पहुंचे हैं, जिससे इनके पूर्ववर्ती चुने गए हैं। 2014 से पहले भी तेरह बार देश ने अपना प्रतिनिधत्व चुना है। हर युग अपने समय के नायक गढ़ता है, आप उन्हें अपनी ताकत से खारिज करते हैं तो पंरपराओं का अनिष्ट गढ़ रहे होते हैं। संसद पर माथा टेकने से ही मर्यादाओं का सम्मान नहीं होता, सम्मान के निर्वहन से होता है। अलबत्ता तो, ये कोई अवसर ही नही था, इस प्रकार के प्रलाप का, फिर भी इतिहास के पृष्ठ उनके समय और योगदान से भरे पड़े हैं।( भले ही एक विचारधारा विशेष अपने मौखिक दुष्प्रचार से ये सिद्ध करती रहे कि इतिहास ही गलत है, बस वे ही सही हैं) कम से कम भारत के प्रधानमंत्री से भारत की स्वतंत्रता के इतिहास पुरुषों के विषय में सही जानकारी अपेक्षित है। हो सकता है, प्र. म.अपने कार्यकाल के जरूरी सवालों से बचना चाहते हों, कोई प्रयोजित जबाब देना चाहते हों, या फिर विपक्ष का कोलाहल से विचलित हो गए हो, किन्तु उसके लिए ये सिद्ध करने की क्या जरूरत है कि देश मे वे पहले और अंतिम अवतारी सम्राट है जो अपने अश्वमेघ से देश को उपकृत कर हैं। ये सब कार्य वे चुनावी सभाओं में करते ही हैं। 2018-19, में कीजिये, किन्तु संसद को लोकतंत्र की परम्पराओं का मंदिर बना रहने दें। विपक्ष से भी उम्मीद करनी चाहिए कि जिन परम्पराओं को बड़ी मेहनत से बनाया है उनका रक्षण सबका दायित्व है। कुल मिलाकर लोकसभा में आज लोकतंत्र शर्मशार हुआ है

रास बिहारी गौड़

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