वो पल , वो बीतें पल …

एक छोटी सी कहानी है, दो नादान परिंदो की, कुछ महफूज़ सी बाते हैं और ना जाने कितनी यादें है। इत्मीनान से बताती हूँ, धोरा घोर फरमाइयेगा , भावनाओं में बहते-बहते , डूबती नाव बचा लीजियेगा।


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 वो पल , वो बीतें पल …

वो  पल, वो बीतें पल…

 वो पल , वो बीतें पल … 
जिनमे हम ,बस चलते ही रह जाते है।

सोचके उन लम्हो को हम आज भी मुस्कुरा जाते है,

क्या गम हैं ज़िंदगी मे ,हम फिरसे ना जाने क्यों भूल जाते है,

प्यारी सी उन यॉदो मे , जाने कहॉ खो जाते है,

वही हसीन लमहें , ऑसु क्यो दे जाते है?

चाहत थे ना आप किसी की, फिर हमारी चाहत क्यों जानना चाहते हैं?

राहत थे ना आप किसी की , फिर रासते क्यों बदल जाते हैं?

उस हसी में हम , पहले जैसी मुस्कान क्यों गायब पाते हैं?

पाकर सब कुछ भी हम, खुदको लापता क्यों पाते हैं?

हसती-खेलती ज़िंदगी में, अंधेरा क्यों हम पाते है?

याद करके फिर तुम्हे , इस जहां को रंगीन पाते हैं,

कहना था जो तुम्हे, कह क्यों नहीं पाते है?

अजीब सी इस ज़िंदगी मे, चलते ही बने जाते है,

फिर पलटके देखा तो, तुम्हारे बिना रह क्यों ना पाते है?

भागती-दौडती ज़िंदगी में , बस चलते ही रह जाते हैं,

उन दिनों की बात हैं यह, जो आज भी हमको याद है,

जब यादें कम और बातें ज्यादा थी, खामोशी में भी लव्ज़ छुप्पे थे,

और आज वो सब एक बिखरी कहानी हैं।

उस कहानी को समेटने की कोशिश में, हम खुदको खोया पाते हैं,

क्योंकि कहानी तो बस एक है, पर पन्ने तो हज़ार हैं,

कहॉ से सुरू करे और कहॉ खत्म , बस यही सोचते रह जाते है,

ज़िंदगी तो अभी भी रंगीन है,

फिर किस फूल की कमी हैं?

महक तो अभी भी है ज़िंदगी में,

परंतु ईत्र थोरा ज्यादा है , मिलावटी ज़िंदगी में,

बोलने को बचा  क्या है?,

यही पूछेंगेना आप,

बस एक बार घोर फरमाइएगा इन ऑखों पर,

आप खुदही समझ जाएगें ।


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वो पल ही याद बन जाएँगे…

देखा , सुना , समझा … सब कुछ किया , परंतु क्या करे सपना था सपना ही रह गया। गहरी नींद की वो याद थी जो वापस लौटकर ना आई, आँखे खुली और पता चला याद थी जो याद ही बनकर रह गई

वो पल ही याद बन जाएँगे…

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