सीखने की प्रक्रिया

मनुष्य के विकास की प्रक्रिया स्वभाविक और प्राकृतिक है। गर्भधारण के समय से ही बालक का विकास क्रम प्रारंभ हो जाता है, जो विभिन्न अवस्थाओं से होते हुए मृत्यु तक चलती है।                                                                                    growth and development– growth से तात्पर्य व्यक्ति की शारीरिक लंबाई, चौड़ाई और भार में वृद्धि से होता है। व्यक्ति की शारीरिक रचना में परिवर्तन होने का सर्व प्रमुख, कारण वाह्य वातावरण से अंतः क्रिया करना है। Development से तात्पर्य है व्यक्ति में यथासंभव होने वाले परिवर्तन को ही विकास कहा जाता है।विकास के अंतर्गत व्यक्ति की मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक तथा शारीरिक दृष्टि से होने वाले परिवर्तनों को सम्मिलित किया जाता है।                                                                                      जैसे -जैसे अवस्थाएं बढ़ती है उसी रूप में हमारा क्रमिक विकास होता है। इन अवस्थाओं को निम्न भागों में बांटा गया है–।                                                                                     1.   जन्म पूर्व अवस्था  (prenatal stage).                        2.   शैशवावस्था (Infancy).                                                  3.    पूर्व बाल्यावस्था (Early childhood).                         4.   उत्तर बाल्यावस्था (late childhood).                          5.     किशोरावस्था (adolescence).                                    6.     प्रौढ़ावस्था ( adulthood).                                             1. जन्म पूर्व अवस्था (prenatal stage)—.                                                                                        माता के गर्भ में बीजा रोपण से लेकर जन्म तक की अवस्था को जन्म पूर्व अवस्था कहते हैं। माता के रजकण (ovum) तथा पिता के शुक्राणु (sperm) के मिलन के बाद विकास प्रारंभ हो जाता है। इस नौ महीने की अवधि में भ्रूण का विकास तीव्र गति से होता है इस अवस्था को भी तीन भागों में बांटा गया है—.                                                                                             1. डिंब अवस्था( the period of ovum). –                      गर्भधारण से दो सप्ताह तक।                                                  2. भ्रूण अवस्था (the period of ambryo)–.                  दो से आठ सप्ताह तक।                                                            3. गर्भस्थ शिशु अवस्था(the period of foetus)–:.         आठ सप्ताह से जन्म तक।                                                      


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जन्म पूर्व अवस्था शिक्षा मनोवैज्ञानिक के दृष्टिकोण से अधिक महत्व पूर्ण अवस्था नहीं होती, क्योंकि बच्चा माता के गर्भ में होता है अतः जो सावधानियां और दिशा निर्देश होते हैं वे माता के लिए होते हैं, जिससे कि गर्भस्थ शिशु का विकास उचित रूप से हो सके।                                                2. शैशवावस्था (infancy)—:.                                                                                                शिशु जन्म से लेकर 2 वर्ष तक की अवस्था को शैशवावस्था कहते है। इस अवस्था में शारीरिक विकास बहुत तीव्र गति से होता है। वाटसन के अनुसार, “शैशवावस्था में सीखने की सीमा और तीव्र विकास की किसी अवस्था की तुलना में बहुत अधिक होती है।”जन्म के बाद प्रथम 4 महीने में शिशु की लंबाई 25 से 26 इंच हो जाती है और दूसरे वर्ष प्राय: 4 इंच और बढ़ जाती है। वहीं शिशु का वजन 1 वर्ष के अंत में 21 पाउंड तथा 2 वर्ष के अंत तक प्राय: 25 पाउंड हो जाता है। इस अवस्था में मस्तिष्क का काफी विकास हो जाता है जिससे शिशु देख सकता है, आवाज कर सकता है, साथ ही स्वैच्छिक क्रियाएं भी कर सकता है, वह किसी अजनबी व्यक्ति के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकता है।


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फर्म के 2 महीनों में ही सिर को हिलाने व आंखों में गति करने लगता है। छह माह होने तक करवट लेने लगता है। आठ माह का बालक बिना किसी सहारे के काफी समय तक बैठ सकता है।लगभग 10 माह का बालक किसी चीज को पकड़ कर खड़ा हो जाता है बाद में वह धीरे धीरे चलना सीख जाता है।                                                                            3. बाल्यावस्था (childhood)–:.                                                                                              2 से 12 साल की अवधि बाल्यावस्था मानी जाती है। मनोवैज्ञानिकों ने बाल्यावस्था को व्यक्ति के जीवन के निर्माण कारी अवस्था बताते हुए कहा है कि इस अवस्था में जो आदतें व ढंग विकसित हो जाते हैं उन्हें आगे जाकर परिवर्तन करना बड़ा ही कठिन होता है। पूर्व बाल्यावस्था (2 से 6 वर्ष) मैं तो विकास तेजी से होता है परंतु 6 या 7 वर्ष की आयु में बालक के सामान्य विकास की गति धीमी पड़ जाती है। उसकी शारीरिक शक्ति में दृढ़ता आ जाती है। 


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 इस अवस्था में लड़के शक्तिशाली दिखाई देते हैं,   जब की लड़कियां नाजुक और लचीली दिखाई देती हैं। इस अवस्था में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण नहीं होता है बल्कि समान लिंगो में प्रेम देखा जाता है।                                           5. किशोरावस्था (adolescence)–:.                                                                                                मानव जीवन के विकास की प्रक्रिया में किशोरावस्था का स्थान महत्वपूर्ण है। इसे बाल्यावस्था तथा प्रौढ़ावस्था के मध्य   का संधि काल कहते हैं। इस अवस्था में बालक स्वयं को बड़ा समझता है और बड़े उसे छोटे समझते है। साधारणतया किशोरावस्था बालकों में लगभग 13 वर्ष की आयु में तथा बालिकाओं में लगभग 12 वर्ष की आयु में प्रारंभ होती है इसे दो भागों में विभाजित किया गया है–पहला, पूर्व किशोरावस्था जो कि 13 से 18 वर्ष तक होती है। दूसरा, उत्तर किशोरावस्था जो 18 से प्रारंभ होकर 21 वर्ष तक चलती है।  


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किशोरावस्था में व्यक्ति के भार और लंबाई में वृद्धि होती है। मांस पेशिया और शारीरिक ढांचे में दृढ़ता आती है। लड़कों में सीना, कंधे तथा कुले पूर्ण रूप से विकसित होकर खड़े हो जाते हैं। लड़कियों में कूल्हे की हड्डियों के पास चर्बी एकत्र होने पर है और उन में भारीपन आने लगता है उनके वक्ष स्थल पर उभर आना प्रारंभ हो जाता है। लड़के- लड़कियों के जननांगों, कलाइयों, बगलो में  बाल उग आते हैं। लड़कों में दाढ़ी मूछ बढ़ने लगती है।किशोरावस्था में प्रजनन अंगों का पूर्ण विकास हो जाता है और संतान प्राप्ति की क्षमता उत्पन्न हो जाती है। इससे लड़कों में स्वपन दोष एवं लड़कियों में मासिक स्राव होना प्रारंभ हो जाता है।


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इस अवस्था में किशोर अपने आप को तथा अपने से  विषमलैंगिकों से प्रेम करना चाहता है। इसके साथ ही वह यौन शिक्षा की आवश्यकता को भी महसूस करता है। किशोर अपनी आगामी जीवन में अपने मनपसंद जीवनसाथी के साथ वैवाहिक जीवन जीना चाहता है।

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